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वन पर्व
अध्याय २५३
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वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठन्ति वर्त्मानि नवान्यमूनि; वृक्षाश्च न म्लान्ति तथैव भग्नाः |  १६   क
आवर्तय़ध्वं ह्यनुय़ात शीघ्रं; न दूरय़ातैव हि राजपुत्री ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति