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वन पर्व
अध्याय २५३
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वैशम्पाय़न उवाच
संनह्यध्वं सर्व एवेन्द्रकल्पा; महान्ति चारूणि च दंशनानि |  १७   क
गृह्णीत चापानि महाधनानि; शरांश्च शीघ्रं पदवीं व्रजध्वम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति