वन पर्व  अध्याय २५३

वैशम्पाय़न उवाच

पुरा हि निर्भर्त्सनदण्डमोहिता; प्रमूढचित्ता वदनेन शुष्यता |  १८   क
ददाति कस्मैचिदनर्हते तनुं; वराज्यपूर्णामिव भस्मनि स्रुचम् ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति