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वन पर्व
अध्याय २५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो मृगव्यालगणानुकीर्णं; महावनं तद्विहगोपघुष्टम् |  २   क
भ्रातॄंश्च तानभ्यवदद्युधिष्ठिरः; श्रुत्वा गिरो व्याहरतां मृगाणाम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति