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वन पर्व
अध्याय २५३
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रचुक्रुशुश्चाप्यथ सिन्धुराजं; वृकोदरश्चैव धनञ्जय़श्च |  २६   क
यमौ च राजा च महाधनुर्धरा; स्ततो दिशः संमुमुहुः परेषाम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति