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शान्ति पर्व
अध्याय २५४
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भीष्म उवाच
ये च छिन्दन्ति वृषणान्ये च भिन्दन्ति नस्तकान् |  ३७   क
वहन्ति महतो भारान्वध्नन्ति दमय़न्ति च ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति