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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
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धृतराष्ट्र उवाच
चत्वारः सचिवा यस्य भ्रातरो विपुलौजसः |  ११   क
लोकपालोपमा ह्येते सर्वे धर्मार्थदर्शिनः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति