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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
ततो रविं संहृतरश्मिजालं; दृष्ट्वा भृशं शस्त्रपरिक्षताङ्गाः |  १२७   क
तदैन्द्रमस्त्रं विततं सुघोर; मसह्यमुद्वीक्ष्य युगान्तकल्पम् ||  १२७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति