आश्रमवासिक पर्व  अध्याय १४

धृतराष्ट्र उवाच

तन्मय़ा साधु वापीदं यदि वासाधु वै कृतम् |  ६   क
तद्वो हृदि न कर्तव्यं मामनुज्ञातुमर्हथ ||  ६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति