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वन पर्व
अध्याय २५४
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द्रौपद्यु उवाच
यः सर्वधर्मार्थविनिश्चय़ज्ञो; भय़ार्तानां भय़हर्ता मनीषी |  १४   क
यस्योत्तमं रूपमाहुः पृथिव्यां; यं पाण्डवाः परिरक्षन्ति सर्वे ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति