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वन पर्व
अध्याय २५४
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द्रौपद्यु उवाच
यस्याद्य कर्म द्रक्ष्यसे मूढसत्त्व; शतक्रतोर्वा दैत्यसेनासु सङ्ख्ये |  १६   क
शूरः कृतास्त्रो मतिमान्मनीषी; प्रिय़ङ्करो धर्मसुतस्य राज्ञः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति