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वन पर्व
अध्याय २५४
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वैशम्पाय़न उवाच
आय़ान्तीमे पञ्च रथा महान्तो; मन्ये च कृष्णे पतय़स्तवैते |  ३   क
सा जानती ख्यापय़ नः सुकेशि; परं परं पाण्डवानां रथस्थम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति