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वन पर्व
अध्याय २५४
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द्रौपद्यु उवाच
आख्यातव्यं त्वेव सर्वं मुमूर्षो; र्मय़ा तुभ्यं पृष्टय़ा धर्म एषः |  ५   क
न मे व्यथा विद्यते त्वद्भय़ं वा; सम्पश्यन्त्याः सानुजं धर्मराजम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति