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वन पर्व
अध्याय २५४
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द्रौपद्यु उवाच
अप्येष शत्रोः शरणागतस्य; दद्यात्प्राणान्धर्मचारी नृवीरः |  ८   क
परैह्येनं मूढ जवेन भूतय़े; त्वमात्मनः प्राञ्जलिर्न्यस्तशस्त्रः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति