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वन पर्व
अध्याय २५४
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द्रौपद्यु उवाच
अथाप्येनं पश्यसि यं रथस्थं; महाभुजं शालमिव प्रवृद्धम् |  ९   क
सन्दष्टोष्ठं भ्रुकुटीसंहतभ्रुवं; वृकोदरो नाम पतिर्ममैषः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति