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शान्ति पर्व
अध्याय २५५
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जाजलिरु उवाच
कृष्या ह्यन्नं प्रभवति ततस्त्वमपि जीवसि |  २   क
पशुभिश्चौषधीभिश्च मर्त्या जीवन्ति वाणिज ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति