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शान्ति पर्व
अध्याय २५५
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तुलाधार उवाच
यथा सर्वरसैस्तृप्तो नाभिनन्दति किञ्चन |  २०   क
तथा प्रज्ञानतृप्तस्य नित्यं तृप्तिः सुखोदय़ा ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति