वन पर्व  अध्याय ८१

पुलस्त्य उवाच

इन्द्रमार्गं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप |  १५८   क
अहोरात्रोपवासेन शक्रलोके महीय़ते ||  १५८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति