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शान्ति पर्व
अध्याय २५५
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तुलाधार उवाच
प्रापय़ेय़ुः प्रजाः स्वर्गं स्वधर्मचरणेन वै |  २७   क
इति मे वर्तते वुद्धिः समा सर्वत्र जाजले ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति