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शान्ति पर्व
अध्याय २५५
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जाजलिरु उवाच
यतो यज्ञः प्रभवति नास्तिक्यमपि जल्पसि |  ३   क
न हि वर्तेदय़ं लोको वार्तामुत्सृज्य केवलम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति