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वन पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
इन्द्राशनिसमस्पर्शैर्वेगवद्भिरजिह्मगैः |  २७   क
मद्वाणैर्वध्यमानास्ते समुद्विग्नाः स्म दानवाः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति