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शान्ति पर्व
अध्याय २५५
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तुलाधार उवाच
वक्ष्यामि जाजले वृत्तिं नास्मि व्राह्मण नास्तिकः |  ४   क
न च यज्ञं विनिन्दामि यज्ञवित्तु सुदुर्लभः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति