वन पर्व  अध्याय २०३

मार्कण्डेय़ उवाच

एवं तु सूक्ष्मे कथिते धर्मव्याधेन भारत |  १   क
व्राह्मणः स पुनः सूक्ष्मं पप्रच्छ सुसमाहितः ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति