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वन पर्व
अध्याय १९४
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मार्कण्डेय़ उवाच
शय़ानं शय़ने दिव्ये नागभोगे महाद्युतिम् |  १४   क
वहुय़ोजनविस्तीर्णे वहुय़ोजनमाय़ते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति