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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
ततः शरैर्हेमपुङ्खैः सगदं रथिनां वरम् |  ६१   क
छादय़ामास समरे मेघः सूर्यमिवोदितम् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति