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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रिगर्तराजः सुरथस्तस्याथ रथधूर्गतः |  १८   क
रथमाक्षेपय़ामास गजेन गजय़ानवित् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति