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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
नकुलस्त्वपभीस्तस्माद्रथाच्चर्मासिपाणिमान् |  १९   क
उद्भ्रान्तं स्थानमास्थाय़ तस्थौ गिरिरिवाचलः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति