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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
नकुलस्तस्य नागस्य समीपपरिवर्तिनः |  २१   क
सविषाणं भुजं मूले खड्गेन निरकृन्तत ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति