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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
स तत्कर्म महत्कृत्वा शूरो माद्रवतीसुतः |  २३   क
भीमसेनरथं प्राप्य शर्म लेभे महारथः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति