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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
वीणापणववेणूनां स्वनश्चातिमनोरमः |  ५   क
प्रहास इव विस्तीर्णः शुश्रुवे तस्य वेश्मनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति