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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
हतेषु तेषु वीरेषु सिन्धुराजो जय़द्रथः |  ३२   क
विमुच्य कृष्णां सन्त्रस्तः पलाय़नपरोऽभवत् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति