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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
सव्यसाची तु तं दृष्ट्वा पलाय़न्तं जय़द्रथम् |  ३६   क
वारय़ामास निघ्नन्तं भीमं सैन्धवसैनिकान् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति