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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
न हि मे मोक्ष्यते जीवन्मूढः सैन्धवको नृपः |  ४२   क
पातालतलसंस्थोऽपि यदि शक्रोऽस्य सारथिः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति