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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
श्यामाकभोजनं तत्र यः प्रय़च्छति मानवः |  ५६   क
देवान्पितॄंश्च उद्दिश्य तस्य धर्मफलं महत् |  ५६   ख
एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता ||  ५६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति