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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपदीमनुशोचद्भिर्व्राह्मणैस्तैः समागतैः |  ४९   क
समिय़ाय़ महाप्राज्ञः सभार्यो भ्रातृमध्यगः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति