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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
तदन्तरमथावृत्य कोटिकाश्योऽभ्यहारय़त् |  ५   क
महता रथवंशेन परिवार्य वृकोदरम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति