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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
इदमत्यद्भुतं चात्र चकार पुरुषोऽर्जुनः |  ५३   क
क्रोशमात्रगतानश्वान्सैन्धवस्य जघान यत् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति