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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
स हि दिव्यास्त्रसम्पन्नः कृच्छ्रकालेऽप्यसम्भ्रमः |  ५४   क
अकरोद्दुष्करं कर्म शरैरस्त्रानुमन्त्रितैः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति