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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
अनेन वीर्येण कथं स्त्रिय़ं प्रार्थय़से वलात् |  ५८   क
राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्तं पलाय़नम् |  ५८   ख
कथं चानुचरान्हित्वा शत्रुमध्ये पलाय़से ||  ५८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति