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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युच्यमानः पार्थेन सैन्धवो न न्यवर्तत |  ५९   क
तिष्ठ तिष्ठेति तं भीमः सहसाभ्यद्रवद्वली |  ५९   ख
मा वधीरिति पार्थस्तं दय़ावानभ्यभाषत ||  ५९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति