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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
राजा स्वय़ं सुवीराणां प्रवराणां प्रहारिणाम् |  ९   क
निमेषमात्रेण शतं जघान समरे तदा ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति