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शान्ति पर्व
अध्याय २५६
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भीष्म उवाच
स्पर्धां जहि महाप्राज्ञ ततः प्राप्स्यसि यत्परम् |  १६   क
श्रद्धावाञ्श्रद्दधानश्च धर्मांश्चैवेह वाणिजः |  १६   ख
स्ववर्त्मनि स्थितश्चैव गरीय़ानेष जाजले ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति