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कर्ण पर्व
अध्याय ४५
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भीम उवाच
तद्भीमसेनस्य वचो निशम्य; सुदुर्वचं भ्रातुरमित्रमध्ये |  ६५   क
द्रष्टुं कुरुश्रेष्ठमभिप्रय़ातुं; प्रोवाच वृष्णिप्रवरं तदानीम् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति