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वन पर्व
अध्याय ७२
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वाहुक उवाच
आत्मैव हि नलं वेत्ति या चास्य तदनन्तरा |  १६   क
न हि वै तानि लिङ्गानि नलं शंसन्ति कर्हिचित् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति