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शान्ति पर्व
अध्याय २५७
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भीष्म उवाच
छिन्नस्थूणं वृषं दृष्ट्वा विरावं च गवां भृशम् |  २   क
गोग्रहे यज्ञवाटस्य प्रेक्षमाणः स पार्थिवः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति