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शान्ति पर्व
अध्याय २५७
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भीष्म उवाच
सर्वकर्मस्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुरव्रवीत् |  ५   क
कामरागाद्विहिंसन्ति वहिर्वेद्यां पशून्नराः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति