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शान्ति पर्व
अध्याय २८२
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पराशर उवाच
अप्रनष्टे ततो धर्मे भवन्ति सुखिताः प्रजाः |  १३   क
सुखेन तासां राजेन्द्र मोदन्ते दिवि देवताः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति