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वन पर्व
अध्याय २५७
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जनमेजय़ उवाच
एवं हृताय़ां कृष्णाय़ां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् |  १   क
अत ऊर्ध्वं नरव्याघ्राः किमकुर्वत पाण्डवाः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति