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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
तत्र ह्यपापकर्माणः शुचय़ोऽत्यन्तनिर्मलाः |  ९   क
लोभमोहपरित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति