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वन पर्व
अध्याय २५७
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं हि पत्नीमस्माकं धर्मज्ञां धर्मचारिणीम् |  ५   क
संस्पृशेदीदृशो भावः शुचिं स्तैन्यमिवानृतम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति