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वन पर्व
अध्याय २५७
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वैशम्पाय़न उवाच
न हि पापं कृतं किञ्चित्कर्म वा निन्दितं क्वचित् |  ६   क
द्रौपद्या व्राह्मणेष्वेव धर्मः सुचरितो महान् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति